अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ती नजदीकियां पाकिस्तान के लिए बड़ा कूटनीतिक झटका क्यों हैं

अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ती नजदीकियां पाकिस्तान के लिए बड़ा कूटनीतिक झटका क्यों हैं

ईरान और अमेरिका के रिश्तों में जमी बर्फ पिघलना शुरू हो गई है। यह खबर दुनिया के कई देशों के लिए राहत भरी हो सकती है, लेकिन इस्लामाबाद में बैठे रणनीतिकारों की नींद उड़ाने के लिए काफी है। पिछले कुछ हफ्तों में तेहरान और वाशिंगटन के बीच जिस तरह की बैक-चैनल बातचीत और संभावित सीजफायर की खबरें आई हैं, उन्होंने पाकिस्तान की विदेश नीति की चूलें हिला दी हैं। सालों से पाकिस्तान ने इस क्षेत्रीय तनाव का फायदा उठाया है। उसने खुद को एक 'जरूरी मध्यस्थ' या एक 'बफर स्टेट' के रूप में पेश किया। अब वो खेल खत्म होता दिख रहा है।

पाकिस्तान की कूटनीति हमेशा से 'संकट में अवसर' खोजने वाली रही है। जब तक अमेरिका और ईरान एक-दूसरे के खून के प्यासे थे, पाकिस्तान की अहमियत बनी हुई थी। वाशिंगटन को अफगानिस्तान में स्थिरता और ईरान पर नजर रखने के लिए पाकिस्तान के साथ की जरूरत थी। वहीं, ईरान को अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के बीच एक पड़ोसी के तौर पर पाकिस्तान से व्यापारिक उम्मीदें थीं। अब जबकि समीकरण बदल रहे हैं, पाकिस्तान खुद को अलग-थलग महसूस कर रहा है।

अमेरिका और ईरान के बीच कम होती कड़वाहट का असली सच

ईरान और अमेरिका के बीच हालिया अनौपचारिक सीजफायर और कैदियों की अदला-बदली केवल एक मानवीय कदम नहीं है। यह एक सोची-समझी वैश्विक रणनीति का हिस्सा है। जो बाइडन प्रशासन मिडिल ईस्ट में एक और फ्रंट नहीं खोलना चाहता। अमेरिका का ध्यान अब पूरी तरह से चीन और यूक्रेन पर केंद्रित है। ईरान भी अपनी गिरती अर्थव्यवस्था को संभालने के लिए प्रतिबंधों में ढील चाहता है।

इस समझौते का सीधा असर पाकिस्तान की प्रासंगिकता पर पड़ता है। दशकों से पाकिस्तान ने अमेरिकी फंड और सैन्य मदद हासिल करने के लिए ईरान के 'खतरे' को भुनाया है। उसने पश्चिम को यह यकीन दिलाया कि ईरान के प्रभाव को रोकने के लिए पाकिस्तान का मजबूत होना जरूरी है। अगर अमेरिका और ईरान सीधे मेज पर बैठकर बात कर रहे हैं, तो उन्हें पाकिस्तान जैसे 'बिचौलिए' की क्या जरूरत? पाकिस्तान की विदेश नीति का यह बुनियादी स्तंभ ढह गया है।

ईरान-पाकिस्तान गैस पाइपलाइन और ठंडे बस्ते में जाती योजनाएं

पाकिस्तान और ईरान के बीच सबसे बड़ा मुद्दा हमेशा से 'पीस पाइपलाइन' यानी ईरान-पाकिस्तान गैस पाइपलाइन रहा है। पाकिस्तान की ऊर्जा जरूरतें आसमान छू रही हैं। देश अंधेरे में डूबा है, लेकिन वो इस पाइपलाइन को पूरा करने की हिम्मत नहीं जुटा पाया। क्यों? क्योंकि उसे अमेरिका के प्रतिबंधों का डर था। पाकिस्तान सालों तक अमेरिका को यह कहकर टालता रहा कि उसे ईरान से ऊर्जा चाहिए, और ईरान को यह कहकर कि अमेरिका उसे काम नहीं करने दे रहा।

अब खेल बदल गया है। अगर अमेरिका खुद ईरान के साथ सौदेबाजी कर रहा है, तो पाकिस्तान के पास बहाने खत्म हो गए हैं। तेहरान अब पाकिस्तान पर दबाव बना रहा है कि या तो पाइपलाइन पूरी करो या अरबों डॉलर का जुर्माना भरो। पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था पहले से ही वेंटिलेटर पर है। उसके पास जुर्माना भरने के पैसे नहीं हैं और पाइपलाइन बनाने के लिए तकनीकी क्षमता नहीं। अमेरिका के साथ ईरान की सीधी बातचीत ने पाकिस्तान को उसकी अपनी अक्षमता के साथ अकेला छोड़ दिया है।

चाबहार बंदरगाह और भारत का बढ़ता प्रभाव

पाकिस्तान की कूटनीतिक नाकामी का एक और बड़ा पहलू चाबहार है। ईरान और अमेरिका के बीच तनाव कम होने का मतलब है कि चाबहार बंदरगाह पर काम की गति बढ़ेगी। भारत के लिए यह एक बड़ी जीत है। पाकिस्तान हमेशा से चाहता था कि अफगानिस्तान और मध्य एशिया का व्यापार उसके ग्वादर बंदरगाह से होकर गुजरे।

ईरान और अमेरिका की नजदीकियां भारत के निवेश को और सुरक्षित बनाती हैं। अगर चाबहार पूरी तरह सक्रिय होता है, तो पाकिस्तान का 'ट्रांजिट रूट' वाला कार्ड हमेशा के लिए बेकार हो जाएगा। अफगानिस्तान के साथ पाकिस्तान के रिश्ते पहले ही खराब हैं। अब ईरान के साथ भी रिश्तों में वो गर्माहट नहीं रही। पाकिस्तान ने अपनी जिद्दी नीतियों के कारण खुद को अपने पड़ोसियों से काट लिया है।

क्षेत्रीय संतुलन में पाकिस्तान की घटती साख

पाकिस्तान ने लंबे समय तक सऊदी अरब और ईरान के बीच संतुलन बनाने का दावा किया। उसने खुद को मुस्लिम जगत का नेतृत्व करने वाले देश के रूप में देखा। लेकिन हकीकत यह है कि सऊदी अरब ने खुद चीन की मध्यस्थता से ईरान के साथ हाथ मिला लिया। अब अमेरिका भी उसी राह पर है। पाकिस्तान इस पूरी तस्वीर में कहीं नजर नहीं आता।

दुनिया अब गुटबाजी से निकलकर हितों की बात कर रही है। पाकिस्तान अभी भी पुरानी शीत युद्ध वाली मानसिकता में फंसा है। वो सोचता है कि अगर वो एक पक्ष का साथ देगा, तो उसे इनाम मिलेगा। लेकिन आज की कूटनीति 'जीरो-सम गेम' नहीं है। ईरान अपनी अर्थव्यवस्था बचाने के लिए वाशिंगटन से बात कर रहा है और अमेरिका अपनी ऊर्जा सुरक्षा के लिए तेहरान को रियायत दे रहा है। पाकिस्तान इस नई व्यवस्था में केवल एक मूक दर्शक बनकर रह गया है।

क्या अब भी कोई रास्ता बचा है

पाकिस्तान के पास विकल्प बहुत सीमित हैं। उसे अपनी 'रेंटियर स्टेट' वाली मानसिकता छोड़नी होगी। आप दूसरों के झगड़ों में अपनी दुकान नहीं चला सकते। अमेरिका और ईरान के बीच सीजफायर पाकिस्तान के लिए एक चेतावनी है। इसका मतलब है कि अब वाशिंगटन से मिलने वाली 'मुफ्त की इमदाद' बंद होने वाली है।

पाकिस्तान को अपनी विदेश नीति का पूरी तरह से पुनर्मूल्यांकन करना होगा। उसे यह समझना होगा कि कूटनीति केवल बड़े देशों के बीच झूला झूलना नहीं है। उसे अपनी सीमा के भीतर आतंकवाद पर काबू पाना होगा और पड़ोसियों के साथ व्यापारिक संबंध सुधारने होंगे। अगर वो अब भी चीन के भरोसे बैठा रहा और ईरान-अमेरिका संबंधों को अपनी हार मानता रहा, तो वो आने वाले समय में पूरी तरह अप्रासंगिक हो जाएगा।

अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए उसे ईरान के साथ सीधे और ईमानदार संवाद की जरूरत है। उसे यह तय करना होगा कि क्या वो अमेरिकी प्रतिबंधों के डर में घुट-घुट कर मरना चाहता है या अपनी संप्रभुता का इस्तेमाल कर अपनी जनता को बिजली और गैस देना चाहता है। कूटनीति केवल बयानों से नहीं, ठोस फैसलों से चलती है। पाकिस्तान के लिए वक्त तेजी से निकल रहा है।

अगला कदम उठाते हुए पाकिस्तान को अपने सुरक्षा तंत्र और विदेश मंत्रालय के बीच के तालमेल को ठीक करना चाहिए। जब तक नीतियां रावलपिंडी के चश्मे से देखी जाएंगी, इस्लामाबाद की कूटनीति ऐसे ही फेल होती रहेगी। उसे अपनी अर्थव्यवस्था को केंद्र में रखकर फैसले लेने होंगे, न कि क्षेत्रीय दुश्मनी को। यही एकमात्र तरीका है जिससे वो इस बदलते वैश्विक परिदृश्य में अपनी जगह बचा सकता है।

JP

Joseph Patel

Joseph Patel is known for uncovering stories others miss, combining investigative skills with a knack for accessible, compelling writing.